एक छोटी सी लम्बी कहानी (भाग ४)!

Moonठंढी बयार और मेरी तन्हाई। बहुत ही हसीं रात थी. करवा चौथ की रात। कितनी ही लड़कियों ने ये व्रत रखा था और बेसब्री से चाँद और अपने हमसफ़र का इंतज़ार कर रहीं थीं। मैं छज्जे के एक कोने में खड़ी, ऑंखें बंद किये खूबसूरती में घुलते अपने वज़ूद को महसूस कर रही थी. अपने शहर, अपने लोगों से हज़ारों मील दूर, मैं अब तक इस अन्जाने शहर से अपना रिश्ता नहीं जोड़ पाई थी। ये शहर भी तो अब तक मुझे अपना नहीं पाया था। इसकी आँखों में मैं अब भी किसी दूसरी दुनिया का हिस्सा थी। एक ऐसी दुनिया का जिसका ये शहर दिल खोल कर स्वागत करना नहीं जनता था। ऐसे में मेरी नज़र को हर वक़्त किसी पहचाने चेहरे का इंतज़ार रहता था, कान किसी अपने की आवाज़ सुनने को तरसते रहते थे। इन्हीं सोचों में ग़ुम थी मैं कि तभी पीछे से मेरी रूममेट की आवाज़ आई, “तुम्हारा फ़ोन आया है।”
खुद को ख्यालों के आसमान से वापस हक़ीक़त की ज़मीन पर खींचा मैंने। सामने देखा तो पेड़ों के पीछे शरमाते हुए चाँद पर नज़र पड़ी। तो चाँद को इन मासूम उदास चेहरों पर तरस आ ही गया आख़िर। खिलते हुए चेहरों पर नज़र डाल, मुस्कुराते हुए मैं कमरे में वापस आ गई।

“हेलो! पहचाना मुझे?!”

दिल की धड़कन एक पल को ठहरी थी। फ़ोन उठाते ही जो आवाज़ सुनने को मिली उसे तो मैं लाखों आवाज़ों में भी पहचान सकती थी। वो खनकती हुई आवाज़ में छुपी हुई जादुई मुस्कराहट सामने न होते हुए भी नज़र आ रही थी। कैसा इत्तेफ़ाक़ था ये!!? महीनों गुज़र गए थे हमारी मुलाक़ात को पर कभी भी हमारी बात नहीं हो पाई थी। और हो रही थी तो कब, जब की सपने में भी इसकी गुंजाईश न हो।

“हाँ ! पहचान लिया। तुम्हें कैसे भूल सकती हूँ। ”

“कैसी हो तुम?”

“बस, ठीक-ठाक। तुम कैसे हो?”

“मैं भी ठीक हूँ। सुना की तुम आगे की पढ़ाई के लिए घर से इतनी दूर आ गई हो तो दिल किया तुमसे बात कर लूँ। अन्जान शहर है, तुम अपना ख़्याल रखना। अब तो बात होती रहेगी।”

यकीं नहीं था की जो सुना, वो सही सुना थ। तो मेरी फिक्र थी उसे। पर ये जो उसने कहा, “अब बात होती रहेगी”!! क्या वाकई!! इतने वक़्त तक जो दिल बेचैन रहा करता था, उसे सुकून के वो पल मिल जायेंगे। बात निकलेगी तो वाकई अब दूर तलक जाएगी…

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