पहेली

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ज़िन्दगी,
नज़र आती है हमेशा
एक पहेली सी…
आरिफ़ाना सी…

चल पड़ते हैं हम
कई बार उन्ही रस्तों पर,
जिनसे
गुज़रे हैं पहले भी कभी,

वही हमसफ़र,
नयी रहगुज़र…
वही सफ़र
नए हमनफ़स!

ना ये राहगीरी
ना ये राहबरी
ना ये रस्म-ओ-राह
ना राहते-जाँ…

इसी
आमन्दो – रफ़्त में
गिरफ़्त हम
बस यूँ ही
हमेशा चला चलें!

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एक छोटी सी लम्बी कहानी (भाग ४)!

Moonठंढी बयार और मेरी तन्हाई। बहुत ही हसीं रात थी. करवा चौथ की रात। कितनी ही लड़कियों ने ये व्रत रखा था और बेसब्री से चाँद और अपने हमसफ़र का इंतज़ार कर रहीं थीं। मैं छज्जे के एक कोने में खड़ी, ऑंखें बंद किये खूबसूरती में घुलते अपने वज़ूद को महसूस कर रही थी. अपने शहर, अपने लोगों से हज़ारों मील दूर, मैं अब तक इस अन्जाने शहर से अपना रिश्ता नहीं जोड़ पाई थी। ये शहर भी तो अब तक मुझे अपना नहीं पाया था। इसकी आँखों में मैं अब भी किसी दूसरी दुनिया का हिस्सा थी। एक ऐसी दुनिया का जिसका ये शहर दिल खोल कर स्वागत करना नहीं जनता था। ऐसे में मेरी नज़र को हर वक़्त किसी पहचाने चेहरे का इंतज़ार रहता था, कान किसी अपने की आवाज़ सुनने को तरसते रहते थे। इन्हीं सोचों में ग़ुम थी मैं कि तभी पीछे से मेरी रूममेट की आवाज़ आई, “तुम्हारा फ़ोन आया है।”
खुद को ख्यालों के आसमान से वापस हक़ीक़त की ज़मीन पर खींचा मैंने। सामने देखा तो पेड़ों के पीछे शरमाते हुए चाँद पर नज़र पड़ी। तो चाँद को इन मासूम उदास चेहरों पर तरस आ ही गया आख़िर। खिलते हुए चेहरों पर नज़र डाल, मुस्कुराते हुए मैं कमरे में वापस आ गई।

“हेलो! पहचाना मुझे?!”

दिल की धड़कन एक पल को ठहरी थी। फ़ोन उठाते ही जो आवाज़ सुनने को मिली उसे तो मैं लाखों आवाज़ों में भी पहचान सकती थी। वो खनकती हुई आवाज़ में छुपी हुई जादुई मुस्कराहट सामने न होते हुए भी नज़र आ रही थी। कैसा इत्तेफ़ाक़ था ये!!? महीनों गुज़र गए थे हमारी मुलाक़ात को पर कभी भी हमारी बात नहीं हो पाई थी। और हो रही थी तो कब, जब की सपने में भी इसकी गुंजाईश न हो।

“हाँ ! पहचान लिया। तुम्हें कैसे भूल सकती हूँ। ”

“कैसी हो तुम?”

“बस, ठीक-ठाक। तुम कैसे हो?”

“मैं भी ठीक हूँ। सुना की तुम आगे की पढ़ाई के लिए घर से इतनी दूर आ गई हो तो दिल किया तुमसे बात कर लूँ। अन्जान शहर है, तुम अपना ख़्याल रखना। अब तो बात होती रहेगी।”

यकीं नहीं था की जो सुना, वो सही सुना थ। तो मेरी फिक्र थी उसे। पर ये जो उसने कहा, “अब बात होती रहेगी”!! क्या वाकई!! इतने वक़्त तक जो दिल बेचैन रहा करता था, उसे सुकून के वो पल मिल जायेंगे। बात निकलेगी तो वाकई अब दूर तलक जाएगी…

एक छोटी सी लम्बी कहानी! (भाग २)

उन दिनों ज़िन्दगी से कुछ नाराज़ सी थी मैं।  हर वक़्त खुद से उलझती, थोड़ा – थोड़ा खुद में ही घुलती जा रही थी।  एक तो यूँ ही ज़रा कम बातें करने की आदत थी, पर अब तो होंठों पर एक गहरी ख़ामोशी ने बसेरा कर लिया था।

ऐसे में तुम अक्सर मुझे हैरान कर देते। तुम्हारी मुस्कराहट, तुम्हारी मस्तियाँ, तुम्हारी ज़िंदादिली, तुम्हारी हर एक अदा मुझे हैरान कर देती। बड़े से बड़ा मसला भी तुम्हारे लिए संजीदा न था। दूसरी ओर मैं तो संजीदगी की चादर को हरदम खुद से लपेटे फिरती। छोटी से छोटी उलझन भी मेरे सर का दर्द हो जाती। जब भी तुम्हे देखती तो यही सोचती कि हम कितने मुख्तलिफ शख्शियत के मालिक हैं। ज़िन्दगी तुम्हारे लिए कितनी आसान है, और मेरे लिए काँटों से भरा रास्ता। तुम ज़िन्दगी में बारिश की पहली फुहार की तरह आये थे। तपते हुए मन को ठंढक पहुंचाते हुए।

धीरे-धीरे हर सुबह शाम का इंतज़ार संग ले आने लगी, तुम्हारे आने का पैगाम साथ लिए।और जब तुम आते तो हर ओर जाने कितने रंग बिखर जाते। तन्हाई की सादा चादर पर धनक रंगों को बिखरते देखा है मैंने तुम्हारी मौजूदगी में। दिल करता की वो लम्हा वहीँ थम जाये।  दिल में एक नई ख्वाहिश अंगड़ाई लेने लगती कि काश ये शाम का सिन्दूरी सूरज कभी भी न डूबे…

पर वक़्त कब किसके लिए ठहरा है की मेरे लिए थम जाता! मैं अपनी मुट्ठी में सारे अनमोल पलों को समेटने की कोशिश करती रह गई और वक़्त उँगलियों से फिसलता चला गया।  फिर कभी भी लौट कर न आने के लिए। …

 

एक छोटी सी लम्बी कहानी! (भाग १)

मेरी जान,

ये कहना ज़रा मुश्किल है की ये एहसासात जो मेरे दिल में है उसे ‘पहली नज़र का प्यार’ कह सकते हैं या नही; पर इतना ज़रूर है कि मेरे दिल की धड़कनें एक पल को थम सी गईं थीं जब पहली बार तुम्हें देखा था। एक एक लम्हा मेरे ज़हन में यूँ ताज़ा है जैसे बस कल ही की बात हो…

मैं सीढ़ीओं के पास बैठी हौले से ढलती हुई शाम को देख रही थी, जो मेरी उदासी के रंग को और भी गहरा करती जा रही थी। कभी कTanhaiभी सबकी बातचीत में शामिल भी हो लेती थी। तभी तुम घर आये थे। आकर तुम ठीक मेरे सामने वाली कुर्सी पर बैठ गए। औपचारिक सा परिचय हुआ हमारा और फिर तुम सबके साथ बातों में लग गए । तुम्हारी तवज्जो मेरी तरफ बिलकुल भी नहीं थी, पर मेरी नजरें बार बार तुम्हारे चेहरे पर ठहर सी जाती थीं । मैं चाहकर भी अपनी नज़रों का मरकज़ बदल नहीं पा रही थी । अचानक किसी बात पर तुम मुस्कुराये… और मैं सोचने पर मजबूर हो गई… क्या वाकई किसी की मुस्कराहट इतनी खूबसूरत हो सकती है की आपके पूरे वज़ूद को अपनी गिरफ़्त में ले ले… वो मुस्कुअराहट मेरे दिल के हर कोने को रौशन कर गई ।

तो कुछ यूँ रही हमारी पहली मुलाक़ात। किसे पता था की ये सरसरी सी मुलाक़ात एक दिन एक अनोखी सी कहानी का रंग ले लेगी। एक ऐसी कहानी, जिसका हर लफ्ज़ तुम्हारे नाम हो जायेगा और मैं तुम्हारी आँखों की गहराइयों में डूब के रह जाउंगी। यूँ की किनारे गुम होने लगेंगे।

उस रोज़ अनजाने ही एक शिकस्ता कश्ती में सफर पर निकल पड़ी थी मैं. आने वाली हर लहर, हर तूफान से अन्जान। …