दर्द रिस आया!

हरेक कोना सिल दिया फिर भी

कहीं से कुछ दर्द रिस आया है

दिल की बंज़र ज़मीं पर ये

समंदर कहाँ से उभर आया है

पिघली हँसी शमाँ के साथ-साथ

तारीकियों में एहसास सब नुमायाँ है

महफ़िल भी सजी, बोली भी लगी

दुनिया के सब कारोबार हुए

बेच आई मैं अस्ल-ए-तमन्ना सारी

ख़ाली बाजार मेरे पल्लू से बँधा आया है

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वो चाँद जब टूटा…

वो चाँद जब टूटा,

बिखरे थे कुछ टुकड़े ज़मीं पर

वो लहर एक डूबी,

बाकी एक बूँद ना अब कहीँ पर

फैला हुआ समंदर,

वीरान इस मरू के ठीक अंदर

अठखेलियाँ करते हैं मोती,

छन से गालों पर बिखरकर

रात का भूला मुसाफ़िर,

लौट पाया ना कभी घर

एक लंबी सी कहानी,

रह गई टुकड़ों में सिमटकर

चल नए पन्ने लिखें,

हम बंद किताबों से निकलकर

तक़दीर

वफ़ा, इख़लास, दोस्ती, सारे तर्ज़-ए-मुहब्बत
इन एहसासों से ही मेरे ख्वाबों की रानाई थी

बड़ी शिद्दत से जो सीने में छुपाई थी
वो चीज़ अपनी सी पर फिर भी वो पराई थी

हाथों की लकीरों में लिखा था नाम तेरा
मगर तक़दीर में पोशीदा कुछ बद्दुआएँ थी

सन्नाटों के शोर में गुम थे कुछ शोरों के सन्नाटे
ख़ामोशी से अता हुई अपनी रस्मे-ए-जुदाई थी

Nishana

Azab thi soch bhi apni ki dard ka na koi malal hua,
Zakhm-e-dil pe yun to zamane ke kai sawal rahe…
Neend aankhon se gai par unhe na khayal hua,
Chalaya teer bhi humne, aur nishana bhi khud huye…

एक छोटी सी लम्बी कहानी! (भाग 3)

वो सुनहरे दिन कैसे और कब बीत गए कुछ पता ही नहीं चला। अभी कुछ ही दिनों पहले तो मुलाकात हुई थी और अब जाने का वक़्त करीब आ गया था।

मेरे साथ साथ पूरी चांडाल चौकड़ी भी उदास थी। जाना तो था ही पर लगा कि क्यों न जितना वक़्त बाकी है उसे मस्ती से गुज़ारा जाये। सो हम घूमने निकल पड़े। कभी नदी के किनारे , तो कभी पुराने किले में। सारे धमा-चौकड़ी मचा रहे थे पर मैं अंदर ही अंदर परेशान सी थी। ना, परेशान शायद सही शब्द नहीं है , दरअसल अपने दिल की हालत को लेकर उधेड़- बुन में थी। ये हो क्या गया था मुझे… तुम नज़रों से ओझल होते तो दिल बोझिल हो जाता और तुम्हारे सामने आते ही दिल को सुकून मिल जाता। चाहे हम किसी भी जगह हों, मेरी नजरें बार बार तुम पर ही जाकर रूकती थी।

first-crushतुम्हारी हरकतें मेरी उलझन और बढ़ा रही थीं।  यूँ तो तुम बिल्कुल अन्जान बन सबसे बाते कर रहे होते, पर मेरी नज़र हटते ही उन दिलकश नज़रों की कैद में मेरा वज़ूद होता था। कभी तुम पीछे से बाग़ीचे के फूल उठा मेरे ऊपर बरसा कर निकल जाते फिर नज़ारे देखने में मशगूल हो जाते, तो कभी अँधेरी गुफा में मेरी बढ़ती धड़कनों को और भी तेज़ करने मेरे करीब आ जाते।

देखते-देखते दिन ढला, रात हुई , नींद गई और आँखों-ही-आँखों में सुबह भी आई।  वक़्त का पहिया घूम तो अपनी ही धुन में रहा था पर उसकी रफ़्तार कुछ ज्यादा ही तेज़ मालूम पड़ रही थी।  दिल की नाबूझ कैफ़ियत के साथ उलझते-उलझते लौटने की तयारी पूरी हुई। नम आँखों से, अनकही बातों के साथ अलविदा कहा और चल पड़ी मैं।  उस वक़्त ये मालूम न था कि दिल जिस गम में मुब्तिला हुआ है वो मेरे पाँवों का रुख़ एक काँटों भरे रस्ते कि ओर मोड़ देगा। …