दिल की किताब

grimoire_spell_book_by_moxylyn

चेहरा आईना है दिल की उस किताब का
सबसे छुपा कर सात तालों में जो रख्खी है

हर आँसू पर चमक से उठते हैं वो opening-the-dusty-book

जिन पन्नों पर वक़्त की मोटी गर्द पड़ी है

कुछ लफ्ज़ ख़ुशी के, कई अल्फ़ाज़ ग़मों के
मेरे अफ़साने की लिखाई गहरी बड़ी है

छूने से भी महसूस होता है हरेक हर्फ़
चाहे कितनी ही सियाही धुंधली पड़ी है

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ज़िन्दगी जब शब्दों में ढल जाती है

ज़िन्दगी जब शब्दों में ढल जाती है
कितने बिसराये सफ़े पलट जाती है

चंद टुकड़े सम्भाल ले मेरे कोई
रेत की तरह बिखरी सी चली जाती है

बेहिसाब धड़कती थीं किसी की ख़ातिर
धड़कनें आज भी उसे देख ठहर जाती हैं

ये मुसलसल मसलों के सिलसिले
इतना ही काफ़ी है कि साँस आती है

बिदाई…

स्नेह के घेरे में, ममता की छाओँ में, बसती है बिटिया हमारे मन के गांव में

नाज़ों की पाली है, लाड़ से संभाली है,बिटिया हमारी नाजुक फूलों की डाली है

इसकी हँसी के लिए सब कुछ गँवारा है, इसकी हर ख़ुशी पर तन-मन सब वारा है

बाबा की प्यारी है, अम्मा की दुलारी है, बिटिया हमारी सारे जग से निराली है

चन्दन सा शीतल, मोम का ये रूप रे, कैसे सहेगी ये जीवन की धूप रे

देखा न अब तक तो दुनिया का भेस रे, कैसे रहेगी बिटिया परदेस रे

करते बिदाई निकलती है जान, सौंप रहे तुमको हम अपने प्राण

शोभा है अबसे ये घर की तुम्हारे, जीवन है इसका तुम्हारे सहारे

दिया है तुमको हृदय निकाल के, नाजुक कली को रखना सम्भाल के

तुमसे बंधी है हम सबकी आस, बिनती है तुमसे ना करना निरास…

कोई भी नहीं आया!

ज़िन्दगी की उलझनों में जब भी उलझी हूँ
उन्हें सुलझाने कोई भी नहीं आया
टेढ़ी राहों पर क़दमों ने खाई जब कोई ठोकर
थामने हाथ कोई भी नहीं आया
कहते हैं डूबते को है सहारा तिनके का
क्या हो गर वो तिनका भी नहीं आया
बड़ी मासूमियत से खुरचते हैं ज़ख्मों को
मलहम लगाने कोई भी नहीं आया
ख़ुश हूँ क़ामयाब हूँ तो सारे अपने हैं
आजमाइशें थीं तो कोई भी नहीं आया

अनकही

हैं पढ़े सारे वो ख़त मैंने, जो तूने कभी लिखे नहीं
सुने हर एक हर्फ़ हैं मैंने उन लफ़्ज़ों के जो कहे नहीं
वो गुनगुनाती गली की धूप, हौले से सेहन में फैलती
मन पिघला सोना कर गई, बाँकी पेंच-ओ-ख़म रहे नहीं
आँगन में बिखरी आहटें, दिल में सिमटी कुछ राहतें
दबे पाओं चलके जो आईं थीं, सुकून-ए-बहार वो बहे नहीं
मेरे हमसुखन, मेरे हमनवाँ, कभी यूँ भी तो मेरी सिम्त आ
तू इस तरह मुझे थाम ले, मेरा कुछ भी मुझमें रहे नहीं

तक़दीर

वफ़ा, इख़लास, दोस्ती, सारे तर्ज़-ए-मुहब्बत
इन एहसासों से ही मेरे ख्वाबों की रानाई थी

बड़ी शिद्दत से जो सीने में छुपाई थी
वो चीज़ अपनी सी पर फिर भी वो पराई थी

हाथों की लकीरों में लिखा था नाम तेरा
मगर तक़दीर में पोशीदा कुछ बद्दुआएँ थी

सन्नाटों के शोर में गुम थे कुछ शोरों के सन्नाटे
ख़ामोशी से अता हुई अपनी रस्मे-ए-जुदाई थी

Intezar!

Taariquiyon me doobe huye manzar ki
Chaadar zara hate jab ek chirag jal jaye
Shor me bhi tere kadmo ki chaap sunti hun
Teri har aahat pe zamana mera thahar jay

Uthe hain fir dua me haath sang-dil tere liye
Lab pe aai hai tamanna tera dil dariya ho jaye
Nigah-e-shauk ko hai fakat ab itna sa intezar
Idhar sham dhale aur lautke tu ghar aaye

Nishana

Azab thi soch bhi apni ki dard ka na koi malal hua,
Zakhm-e-dil pe yun to zamane ke kai sawal rahe…
Neend aankhon se gai par unhe na khayal hua,
Chalaya teer bhi humne, aur nishana bhi khud huye…

वक़्त!

वक़्त,
अपनी रफ़्तार से चलता हुआ
हर लम्हा, हर पल
कुछ घट जाता है पलकें झपकाते ही

बातें,
रेत की तरह मुट्ठी से फिसलती हुई
छोड़ जाती हैं,
बस अपने होने का एहसास

खुशियाँ,
जैसे गीली रेत पर पाओं के निशान
एक लहर की उम्र लिए
लहर आई और निशान गायब

मंज़र,
ठहर जाता है आँखों में बस वो
जिस पल लहरों ने निशानों को छुआ था

रह जाती हैं,
कुछ रिश्तों की बिखरी यादें
किसी चूड़ी के टूटे टुकड़े, दर्पण की किरचें

ज़िन्दगी,
अपने दामन में चुपचाप सब समेटे
लिए फिरती है इंतज़ार … मौत का!!!

एक छोटी सी लम्बी कहानी (भाग ४)!

Moonठंढी बयार और मेरी तन्हाई। बहुत ही हसीं रात थी. करवा चौथ की रात। कितनी ही लड़कियों ने ये व्रत रखा था और बेसब्री से चाँद और अपने हमसफ़र का इंतज़ार कर रहीं थीं। मैं छज्जे के एक कोने में खड़ी, ऑंखें बंद किये खूबसूरती में घुलते अपने वज़ूद को महसूस कर रही थी. अपने शहर, अपने लोगों से हज़ारों मील दूर, मैं अब तक इस अन्जाने शहर से अपना रिश्ता नहीं जोड़ पाई थी। ये शहर भी तो अब तक मुझे अपना नहीं पाया था। इसकी आँखों में मैं अब भी किसी दूसरी दुनिया का हिस्सा थी। एक ऐसी दुनिया का जिसका ये शहर दिल खोल कर स्वागत करना नहीं जनता था। ऐसे में मेरी नज़र को हर वक़्त किसी पहचाने चेहरे का इंतज़ार रहता था, कान किसी अपने की आवाज़ सुनने को तरसते रहते थे। इन्हीं सोचों में ग़ुम थी मैं कि तभी पीछे से मेरी रूममेट की आवाज़ आई, “तुम्हारा फ़ोन आया है।”
खुद को ख्यालों के आसमान से वापस हक़ीक़त की ज़मीन पर खींचा मैंने। सामने देखा तो पेड़ों के पीछे शरमाते हुए चाँद पर नज़र पड़ी। तो चाँद को इन मासूम उदास चेहरों पर तरस आ ही गया आख़िर। खिलते हुए चेहरों पर नज़र डाल, मुस्कुराते हुए मैं कमरे में वापस आ गई।

“हेलो! पहचाना मुझे?!”

दिल की धड़कन एक पल को ठहरी थी। फ़ोन उठाते ही जो आवाज़ सुनने को मिली उसे तो मैं लाखों आवाज़ों में भी पहचान सकती थी। वो खनकती हुई आवाज़ में छुपी हुई जादुई मुस्कराहट सामने न होते हुए भी नज़र आ रही थी। कैसा इत्तेफ़ाक़ था ये!!? महीनों गुज़र गए थे हमारी मुलाक़ात को पर कभी भी हमारी बात नहीं हो पाई थी। और हो रही थी तो कब, जब की सपने में भी इसकी गुंजाईश न हो।

“हाँ ! पहचान लिया। तुम्हें कैसे भूल सकती हूँ। ”

“कैसी हो तुम?”

“बस, ठीक-ठाक। तुम कैसे हो?”

“मैं भी ठीक हूँ। सुना की तुम आगे की पढ़ाई के लिए घर से इतनी दूर आ गई हो तो दिल किया तुमसे बात कर लूँ। अन्जान शहर है, तुम अपना ख़्याल रखना। अब तो बात होती रहेगी।”

यकीं नहीं था की जो सुना, वो सही सुना थ। तो मेरी फिक्र थी उसे। पर ये जो उसने कहा, “अब बात होती रहेगी”!! क्या वाकई!! इतने वक़्त तक जो दिल बेचैन रहा करता था, उसे सुकून के वो पल मिल जायेंगे। बात निकलेगी तो वाकई अब दूर तलक जाएगी…