दर्द रिस आया!

हरेक कोना सिल दिया फिर भी

कहीं से कुछ दर्द रिस आया है

दिल की बंज़र ज़मीं पर ये

समंदर कहाँ से उभर आया है

पिघली हँसी शमाँ के साथ-साथ

तारीकियों में एहसास सब नुमायाँ है

महफ़िल भी सजी, बोली भी लगी

दुनिया के सब कारोबार हुए

बेच आई मैं अस्ल-ए-तमन्ना सारी

ख़ाली बाजार मेरे पल्लू से बँधा आया है

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वो चाँद जब टूटा…

वो चाँद जब टूटा,

बिखरे थे कुछ टुकड़े ज़मीं पर

वो लहर एक डूबी,

बाकी एक बूँद ना अब कहीँ पर

फैला हुआ समंदर,

वीरान इस मरू के ठीक अंदर

अठखेलियाँ करते हैं मोती,

छन से गालों पर बिखरकर

रात का भूला मुसाफ़िर,

लौट पाया ना कभी घर

एक लंबी सी कहानी,

रह गई टुकड़ों में सिमटकर

चल नए पन्ने लिखें,

हम बंद किताबों से निकलकर

बेनाम रिश्ते!

तुमसे ही आया था जीने का सलीका
तुम ही ले गए मुझसे जान फिर मेरी

मिल गया है मेरी आँखों को मोती
खो गई है जो, वो मुस्कान थी मेरी

ख्वाबों में आज भी मीठी सी कसक है
चुभ गई जो दिल में वो रात थी तेरी

उस एक लम्हे में अटक हुआ वज़ूद
तुझमें ही उलझी हुई हर बात थी मेरी

बेनाम रिश्ते, कुछ आधे-अधूरे से
मुकम्मल करने की आरज़ू नाकाम थी मेरी

नेह का बादल…

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नेह का बादल बरस
भींगने दे अंतर्मन
स्नेह सुधा से सिंचित हो
मन मरू का हर कण कण

कोई ध्वनि सुन पड़ती है
विजन वन के गहन से
स्वप्न एकाकी विचरते
तोड़ कर सारे बंधन

बंजर भूमि में चुपचाप खड़े
उस एकाकी तरुवर की छाँव
करती शीतल व्याकुल हृदय
निज हिय सहे समस्त दहन

पाषाणों को चीर बही जो
फूट पूर्ण वो जलधारा
महि सी धीर प्राप्ति को
बीते निःशब्द कई एक क्षण

कोरे पन्नों पर हमने भी कुछ रंग भरे थे

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कोरे पन्नों पर हमने भी कुछ रंग भरे थे
अरमानों की कूची से कुछ ख़्वाब ढले थे

वक़्त की शफ़क़ चादर पर हमारे पाँवों के निशाँ
चंद लम्हे मुहब्बत के अपनी भी हथेली पे सजे थे

चाहे कितने ही फासले हों तेरे मेरे दरम्यां
दिलों में अब भी अदावत नहीं, हाँ शिकवे-गिले थे

कुछ रिश्ते ऐसे भी हुए हैं जहाँ में कि
रंजिशें लाख सही, हाथ फिर भी दुआ में उठे थे

ख़याल

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फ़लसफ़ा ज़िन्दगी का उलझा हुआ
हम राहतें ख़्वाहिशों की पाते नहीं

भुलाने कि सारी कोशिशें नाकाम
कुछ ख़याल हैं कि दिल से जाते नहीं

दबी सी आज भी होती है दस्तक मगर
दिल धड़क उठ्ठे जोरों से वो आहटें नहीं

उनके होने से है एहसास खुद के होने का
क्या ही होता ग़र हम वक़्त को आज़माते नहीं
अब के बिछड़े हैं तो तसव्वुर में रूबरू होंगे
फासले मीलों के सही, खो जाएं ये वो रिश्ते नहीं

ख़त !

old_love_lettersवो कुछ ख़त थे, शिकवों के,
शिकायतों के कुछ कलमे थे
ज़र्द पत्तों में लिपटा हुआ दर्द था,
कुछ अपनी रानाइयों के लम्हे थे
सियाही बिगड़ी थी, जहाँ नाम था मेरा,
पलकों से मोती वहाँ टूट के बिखरे थे
कच्ची शबनम में भीगा था माहताब
वो भी अज़ब रात थी जब तुम गए थे
आ फिर बस एक बार जी लें वो सारे लम्हे
संग ज़माने से छुप के जो जिए हमने थे

पहेली

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ज़िन्दगी,
नज़र आती है हमेशा
एक पहेली सी…
आरिफ़ाना सी…

चल पड़ते हैं हम
कई बार उन्ही रस्तों पर,
जिनसे
गुज़रे हैं पहले भी कभी,

वही हमसफ़र,
नयी रहगुज़र…
वही सफ़र
नए हमनफ़स!

ना ये राहगीरी
ना ये राहबरी
ना ये रस्म-ओ-राह
ना राहते-जाँ…

इसी
आमन्दो – रफ़्त में
गिरफ़्त हम
बस यूँ ही
हमेशा चला चलें!

प्रेम…

प्रेम,

सीता सा हो

तो गुज़रता है

अग्नि कि ज्वाला से
प्रेम,

राधा सा हो

तो बिछड़ता है

अपने गोपाला से
प्रेम,

रुक्मिणी सा हो

तो बँटा मिलता है

कितने ही अंशों में
प्रेम,

मीरा सा हो

तो सुख ही ढूँढता है

विष के भी दंशों में

आसाइशें ऐसी

हमराह हज़ारों मिल भी जाएँ मगर
हमकदम हमसाया हर कोई नहीं होता

एक उम्र गुज़री रिश्तों को सहेजते-सहेजते
आसाइशें ऐसी कि खुद को भी संभाला नहीं जाता

दिल के रिश्ते से उम्मीद कुछ जियादा थी
गुज़रा कुछ अरसा तो जाना वो रिश्ता ही अधूरा था

टूटी किरचें ख्वाबों के, अह्द के संजोंते हुए
उस मोड़ पर हूँ जहाँ से कोई रास्ता नहीं जाता